Search
Saturday 23 June 2018
  • :
  • :

वो सात दिन

*आओ आओ नाटक देखो !!*
*आओ आओ नाटक देखो !!*

talwar

ज्ञानी पुरुष कह गए ..
“यह दुनिया एक रंगमंच है ”
फिर तो मेरा देश “Broadway theatre” है !
चौपाल के तमाशों और मेलों से बँधा हुआ है यह ,
मुंशी जी की कहानियों से गूँथा हुआ है यह ,
ग़ालिब के शेरों में पिरोया हुआ है

क्रिकेट , राजनीति और ड्रामा यहाँ कण कण में बसे हैं
और ड्रामा तो सत्य की तरह…
हर वक़्त ..हर जगह
ना इससे पहले कुछ
ना इसके बाद कुछ ।
बिखरा हुआ है यहाँ ड्रामा हर तरफ़ ,फिर भी जाने क्यूँ आज कल लोग हँसते , गाते कम दिखते हैं , यूँ लगता है जैसे रात दिन Shakespeare के पाश में जकड़ें हुए हों ।

ravan-ki-ramayan
मोहल्ला मीटिंग से संसद तक , फ़ेसबुक पोस्ट से Whatsapp चैटिंग तक ,घर से लेकर दफ़्तर तक ,  हर जगह सिर्फ़ ड्रामा ही ड्रामा । कौन डायरेक्ट कर रहा है , कौन ऐक्ट , किसकी स्क्रिप्ट है , किसकी धुन , कुछ पता नहीं …बस हम और तुम दर्शक बन बैठे हैं । जो वो दिखा रहे हैं वो हम देख रहे हैं , ना एक सीन ज़्यादा ,ना एक सीन कम । सभी अपना अपना किरदार छोड़ मुख्य किरदार निभाना चाहते हैं , अनवरत उसकी ओर देख रहे हैं ,यह भूल गए कि वो कोने में ऊपर टँगी प्रोफ़ायल है …जो बॉक्स में बैठा ,संगीत को शोर और शोर को संगीत में बदल रहा है …इस किरदार की वास्तविकता बदल रहा है ।
और हो सकता है अगले ही पल वो “मास्टर डिज़ाइनर” सेट डिज़ाइन बदल दे , ब्लाकिंग बदल दे , तो …सब बराबर ।

फिर जब लगता है कि कहानी ख़त्म होने को है ,चारों ओर अँधेरा है ,कुछ नहीं सूझता है ,
ना दायीं कुर्सी पर कोई है ,ना बाँयी कुर्सी पर ,
बस अँधेरा है..ख़ामोशी है और तुम हो । तभी एक रोशनी पड़ती हैं कहीं कोने में ,
फिर एक किरदार उभरता है,
फिर एक क़िस्सा चालू होता है,
और फिर सब पहले जैसा ।

यही है वो किरदार जो शांति से सब देख रहा है ,पता है उसे कि जब यह ड्रामा ख़त्म होते हर उसका रोल आएगा , और वो पर्दा गिराएगा …कहानी ख़त्म ।

ख़ुशी ख़ुशी अपने किरदार के ताने बाने में हर शख़्स सोचता है .. शायद ,क्या पता ..
अभी..यहीं ..इसी वक़्त इस कहानी की डोर छूट जाए ,
फिर अंधेरे में बजती तालियाँ सुनने के लिए कोई ना होगा ।

यही ज़िंदगी का थियेटर  हैं मेरे भाई ।

base-3-2




Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *